Tuesday, May 10, 2011

समाप्ति

मैं भगवान् में नहीं मानता..इतना बोल कर उस लड़के ने हाथ पीछे खींच लिया| मैंने कब कहा की प्रसाद खाने के लिए भगवान् में मानना जरूरी है| प्रसाद को मिठाई समझ कर भी खाया जा सकता है| लो! ताज़े खोये का है ज़बरदस्त मीठा| भैरो ने फिर से मीठे का एक टुकड़ा उसकी तरफ बढाया| 'मैंने कहा ना मैं प्रसाद नहीं खाता.. आप नाहक जिद्द कर रहे हैं', लड़के ने झुंझला कर कहा|इस तिरस्कार से भैरो को गुस्सा आ गया| फिर यह लड़का उसके सामने था भी क्या, एक दुबला पतला बांस का सरकंडा| भैरो तीस साल का जवान था, शहर आने से पहले उसने पच्चीस साल पहलवानी की थी, ऊँचे कद और गठीले बदन का स्वामी था, उसकी काठी के सामने ये सुकुमार दो मिनट भी नहीं टिकता| पर भैरो ने खुद को संभाला, उसके बगल में जा बैठा| पहले तो मीठे के डब्बे का मुंह रब्बर से कस कर बाँधा फिर इस नवयुवक से मुखातिब हुआ|

नाम क्या है तुम्हारा?- भैरो ने प्यार से पुछा| मेरे नाम से यदि आपकी मंशा मेरा धर्म जानने की है तो बता दूँ की मैं पैदाइश से हिन्दू हूँ, लेकिन फिर भी इश्वर की यह जूठन मुझे ग्राह्य नहीं है| लड़के की आवाज़ में थोड़ा तीखापन था, जो भैरो भांप गया| भैरो ने आवाज़ में और थोड़ी मिसरी घोल कर कहा "मज़हब से मुझे क्या? मैं तो बस नाम जानना चाहता हूँ, , अबे के लहज़े में बात करना मुझे अच्छा नहीं लगता|" लड़का तर्क करने पर उतारू था, उसने उसी लहजे में कहा, 'आप मुझे नास्तिक बुला सकते हैं|' इस पर भैरो सकपका गया| "यह नाम तो तुमने खुद रखा है, माता-पिता ने क्या नाम रक्खा है वो बताओ", भैरो ने क्रोध से पुछा| लड़के ने शायद एक छण में अपने वज़न और भैरो के गुस्से की तुलना की फिर धीरे से बोला- राजेश्वर| 'ओह! मतलब तुम ईश्वरों के राजा हो इसीलिए प्रसाद नहीं खाते', भैरो ने चुटकी लेते हुए कहा| लड़का झेंप गया, आत्मस्वाभिमान से भर कर बोला मैं आपसे पहले ही बतला चूका हूँ की मैं भगवान् में नहीं मानता| ठीक है तुम्हें इश्वर में विश्वास नहीं है मगर खोये में तो है, शुद्ध खोया है, मेरे घर पर बना है, उसे खाने में भगवान् से कैसी लड़ाई, भैरो ने रब्बर खोलते हुए कहा|

आप तकलुफ्फ़ मत कीजिये मैं खाऊंगा नहीं| मैं एक सच्चा नास्तिक हूँ और इतनी आसानी से मुझे आप बरगला नहीं सकते| राजेश्वर लम्बी बहस के मूड में था, भैरो ने अगला सवाल पूछ कर उसका पूरा साथ दिया| अच्छा तो चलो यही बता दो की तुम प्रभु की सत्ता में क्यूँ नहीं मानते- भैरो ने हँसते हुए पुछा
राजेश्वर: आप मुझे इश्वर में मानने का एक तर्क दीजिये, मैं आपको ना मानाने के सौ तर्क दूंगा|
भैरो: मेरे पास तो मानाने के सिवा कोई तर्क नहीं है, ना मैं खुद को तुम्हारी तरह आस्तिक बताता हूँ| तुम ही ना मानाने के कोई तर्क बता दो तो शायद मैं भी आस्तिक हो जाऊं|
रा: आप गलती कर रहे हैं| मैं आस्तिक नहीं नास्तिक हूँ| और इश्वर को ना मानाने का सबसे बड़ा तर्क यह है की मैंने या किसी ने भी इश्वर को नहीं देखा है| आप कृपया इसका खंडन इस प्रतिप्रशन से मत कीजियेगा की क्या तुमने हवा बहते देखि है? एक तो ये तर्क बड़ा पुराना है, दुसरे मुझे ये बड़ा बचकाना लगता है| मैंने हवा को तो महसूस किया है, मगर क्या इश्वर को किसी ने महसूस किया है? लड़के के चेहरे पर जीत की सी मधुर मुस्कान थी|
भै: पहले तो हम आस्तिकता के मतभेद को साफ़ कर लें| मैं तो ये कहता हूँ की जिसकी आस्था है वो आस्तिक है| जिसकी नहीं है वो नास्तिक है| मेरी इश्वर के प्रति जो आस्था है वो इतनी सुदृढ़ नहीं है| यदि तुम मुझे रिझा सको तो मैं इश्वर को छोड़ने में हठ नहीं करूँगा| तुम्हारी भगवान् को ना मानाने में जो आस्था है वो मेरी इश्वर को मानाने की आस्था से कहीं ज्यादा बड़ी है| इस वजह से तुम मुझसे बड़े आस्तिक हो|
रा: आप बात को उलझाने की कोशिश कर रहे हैं, मैं एक पक्का नास्तिक हूँ| इश्वर से मेरा दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है|
भै: मैं भी तो वही कह रहा हूँ| इश्वर को ना मानाने में तुम्हारा विश्वास है, बहुत गहरा है, और मैं उसकी सराहना कर रहा हूँ|
रा: तो फिर इतना समझ लीजिये की मुझे ये शब्द पसंद नहीं है| मैं नास्तिक कहलाना ज्यादा पसंद करूँगा|
भै: नास्तिक| हाँ, आज कल यही फैशन में है| आस्तिक होना अब 'कूल' नहीं माना जाता है| क्यूँ सही कह रहा हूँ ना मैं|
रा: नहीं, ऐसा नहीं है| मैं उन बेवकूफों में नहीं हूँ| मैं अपने ऊपर किसी की सत्ता को स्वीकार नहीं करता| मनुष्य से बढ़ कर मेरे लिए कोई दूसरा नहीं है| मैं ना तो अदृश्य भगवान् में मानता हूँ, ना उन ढोंगियों में जिनमें लोग आस्था रखते हैं|
भै: तुम्हें किसी की आस्था पे सवाल करने का हक नहीं है| क्यूंकि तुम्हारी किसी की सत्ता में ना मानाने की आस्था भी बहुत बड़ी है| जैसे मेरी भगवान् में आस्था तुम्हारे लिए खोखली है, वैसे ही भगवान् में ना मानाने की तुम्हारी ये आस्था मेरे लिए बेबुनियाद है|
रा: तो क्या आप उस ढोंगी सत्य साईं को भगवान् मानते हैं|
भै: नहीं, लेकिन मैं उसे झूठलाता भी नहीं हूँ| तुम ही ने तो अभी कहा ही मनुष्य से ऊपर कोई नहीं है| जब साधन और साधक और लक्ष्य तीनो मनुष्य ही हैं तो फिर सत्य साईं को भगवान् मानाने में क्या कष्ट है?
रा: आप फिर बात को उलझाने की कोशिश कर रहे हैं| मैं आपसे बस इतना पूछ रहा हूँ की क्या आप ये मानते हैं की कोई इंसान भगवान् हो सकता है?
भै: नहीं|
रा: देखा! मैं तो पहले ही समझ रहा था की आप बात को बस उलझा रहे हैं| (उसने यह बात तपाक से बोली और खुश हो गया| जैसे बच्चे के हाथ कोई नया खिलौना लग गया हो)
भै: नहीं! तुमने मुझे अपनी बात पूरी नहीं करने दी| कोई एक इंसान भगवान् हो ऐसा नहीं हो है, सब भगवान् हैं|
रा: क्या बकवास है? तो क्या मैं भगवान् हूँ? फिर क्यूँ आपने मुझे भोग लगाने के बजाये उसे भोग लगाया? यह सब झूठ है| आप बस अपनी बात मनवाना चाह रहे हैं|
भै: मैंने उसे भोग लगाया, उसने ले लिया| फिर तुम्हें भी लगाया लेकिन तुम्हें किसी का जूठा ग्राह्य नहीं था|
रा: मैं नहीं मानता| I am an atheist.
भै: will you please explain who is an atheist.
रा: Someone who denies the existence of god
भै: Denying the existence of something doesn't stop something from existing.
रा: ठीक है| एक पल के लिए मैं मान लेता हूँ की भगवान् है| तो क्या सबका एक ही भगवान् है?
भै: भगवान् कोई अलग नहीं| सब भगवान् हैं|
रा: मतलब सब बराबर के हुए|
भै: हाँ, बिलकुल!
रा: तो फिर क्यूँ कोई गरीब है, कोई बीमार है|
भै: हर सफ़ेद के सफ़ेद होने के लिए काले का होना जरूरी है| जैसे एक स्वस्थ्य भगवान् है, वैसे ही एक बीमार भगवान् भी है|
रा: आप जानते हैं ना की ये एक बड़ा ही बेतुका जवाब है|
भै: बेतुका हो सकता है पर गलत नहीं है| जरूरी नहीं की हर सही बात का तर्क हो|
रा: आपने कभी जानवरों को देखा है| उनके अपने घर में| वे भी जी रहे हैं भगवान् को बिना माने| बिना आरती किये, बिना दीया जलाये वो हमसे कहीं ज्यादा खुश हैं, सुखी हैं|

भैरो के पास इस बात का जवाब नहीं था| बीस-बाईस साल के सुख्ड़े ने उसे घेर कर परास्त कर दिया था| भैरो थोड़ी देर के लिए चुप हो गया और बगल ही में सो रहे कुत्ते को देखने लगा| राजेश्वर शायद अपनी जीत समझ चूका था| उसने बात को कुरेदना उचित नहीं समझा| वो उठा और ज्योंही चलने को हुआ... की भैरो ने उस पर झपट्टा लगा कर अपनी ओर खींचा| किसी बड़ी गाडी की जोर से ब्रेक लगाने की आवाज़ हुई| जब राजेश्वर संभला तो उसने देखा की बस का खलासी उसे गालियाँ दे रहा है और भैरो उसे तिरस्कार की भावना से देख रहा है| अगर भैरो ने सही समय पर झपट्टा ना मारा होता तो आज राजेश्वर किसी आवारा कुत्ते की तरह बस के नीचे आकर अपनी जान गवां चूका होता|

भैरो ने आकाश की तरफ देखते हुए कहा-देखि उसकी माया आज उसने तुम्हें बचा लिया| राजेश्वर ने हँसते हुए कहा, "वो मुझे नहीं बचा सकता, ना आप|" इस बार भैरो से रहा ना गया, उसने अपने अन्दर की आग उगल ही दी-यही प्रॉब्लम है तुम्हारे जेनेरेशन के साथ| किसी चीज़ का मोल नहीं करते तुम लोग| ज़िन्दगी बार-बार नहीं मिलती| प्रभु की दया से तुम अभी बच गए, वर्ना गए थे काम से| "वो इतना भी दयालु नहीं है, अगर होता तो इतने सारे लोगों को बेवक़ूफ़ नहीं बना रहा होता", राजेश्वर की बातों में वही बालहठ था| "यह एक और तरीका है इस दौर में 'कूल' बनने का, हर चीज़ को मजाक में उड़ा दो जैसे ज़िन्दगी कुछ है ही नहीं", भैरो अब गरम हो चूका था, "मौत से डर नहीं लगता तुम्हें?"
रा: नहीं!
भै: बको मत| आज कल के लौंडे बस बहस करना जानते हैं|
रा: आपके जेनेरेशन की भी एक प्रॉब्लम है|बताऊँ? आप लोग सच सुन नहीं सकते| मैं मौत से नहीं डरता क्यूंकि मैं भगवान् नहीं हूँ|
भै: चुप रहो| मेरा पारा और मत चढाओ|
रा: ठीक है तो फिर आप भी चुप हो जाइये|
भै: (बडबडाते हुए) मौत से डर नहीं लगता|हुंह! सब जेम्स बोंड ने सिखाया है|
रा: नहीं, जेम्स बोंड ने नहीं सिखाया है| मैं खुद जानता हूँ|
भै: क्या? जानते क्या हो तुम मौत के बारे में? छटांक भर के लौंडे चले हैं जीवन दर्शन देने|
रा: आप क्या जानते हैं मौत के बारे में? क्या आप कभी मरे हैं?
भै: तो तू क्या मारा है? भूत है तू? सब पता है तुझे परलोक के बारे में?
रा: हाँ मैं मरा हूँ| और ये लोक-परलोक कुछ नहीं होता| मैं मर के यहीं हूँ और आप जिंदा हो कर भी यही हैं| फर्क सिर्फ इतना है की मैं संतुष्ट हूँ और आप आज भी आडम्बर में लगे हैं|
भै: अब बहुत हुआ, ज़बान लड़ाना बंद करो| वरना दूंगा एक खींच के और सच में दम निकल जायेगा, समझे बेटा|
रा: मैंने कहा था ना, आपकी जेनेरेशन में हमारी जेनेरेशन से ज्यादा प्रॉब्लम है| आप सच सुन ही नहीं सकते|
भै: ठीक है... तो तू मर चूका है| कैसे और कब मरा तू?
रा: दो साल पहले, मैंने ख़ुदकुशी कर ली|
भै: मतलब बुजदिल है तू?
रा: ये तो मैं आपके बारे में भी कह सकता हूँ|
भै: ख़ुदकुशी क्यूँ कर ली तुने?
रा: आपने क्यूँ नहीं की?
भै: मत..मत..मतलब....मैं क्यूँ करूँ ख़ुदकुशी? मैं तो अच्छा भला जी रहा हूँ|
रा: तो इससे आप महान हो गए? जी कर ऐसा क्या कर लिया है आपने?मरे क्यूँ नहीं आप?(गुस्से से)
भै: मैं क्यूँ मरुँ?(डर कर)
रा: क्यूँ नहीं मरे आप? आपने ख़ुदकुशी क्यूँ नहीं की?
भै: मेरा परिवार है...
रा: मेरा भी था|
भै: नौकरी है, इज्ज़त है....
रा: मेरा भी था| इसमें ऐसा क्या है? मरे क्यूँ नहीं आप?
भै: मैं...मैं क्यूँ मरुँ मैं? मैं कमज़ोर नहीं हूँ?
रा: हाँ आप कमज़ोर नहीं हैं - कायर हैं आप| कायर! जीने की शक्ति नहीं है आपमें|
भै: मैं तो जी रहा हूँ| मरे तो तुम हो|
रा: इसको जीना कहते हैं आप| घर आ कर माँ से लड़ना| ऑफिस में बॉस से घुड़की खाना| बैंक का लोन| कार का कर्जा| घर का कर्जा, बहिन की शादी| जीवन है ये? ऐसे ही जीने का सपना देखा था आपने? याद कीजिये, क्या यही सपना देखा था आपने?
भै: जरूरी तो नहीं की हर सपना पूरा हो|
रा: ओह! तो आपको याद है अपना सपना| मुझे तो लगा था की आप वो सपना भी झूठला देंगे| १९९४ कॉलेज से निकलते हुए अपने दोस्तों से क्या कहा था आपने याद है?
भै: हाँ याद है| तब मैं तुम्हारे जैसा था| आवेश में कुछ भी बोल जाता है| अब ज़िन्दगी सामने है| सच्चाई सामने है....
रा: ये सच्चाई नहीं कायरता है| ना जीने के बहाने हैं ये सब| आपमें जीने की शक्ति नहीं है| आप वही करना चाहते हैं| सुबह से शाम तक रोज वही लताड़, मैं रोज नहीं मर सकता| मुझे जीना था| मैं आपकी तरह नहीं हो सका| आप ख़ुदकुशी क्यूँ नहीं कर लेते.....

भैरो सोच में डूब जाता है| उसके आँखों के सामने से वो सारे दोस्त, उसकी वो सारी बातें गुज़रती हैं जो उसने कभी कही थी| मैं मर क्यूँ नहीं जाता...हाँ मैं मर क्यूँ नहीं जाता???

Tuesday, March 29, 2011

शून्य

मैं कुछ नहीं करना चाहता -
वैसे ही जैसे नदी कुछ नहीं करती,
वैसे ही जैसे पेड़ कुछ नहीं करता,
वैसे ही जैसे मेघ कुछ नहीं करते।
कुछ नहीं करना चाहना ही अब मेरा लक्ष्य है,
मैं शून्य को साधना चाहता हूँ।

Saturday, March 26, 2011

कलियुग में कबीर

मैंने कबीर का एक दोहा पढ़ लिया था जिसका मतलब मुझे समझ नहीं आ रहा था, सो मैं उस दोहे के साथ गुरुदेव के पास पंहुचा। गुरुदेव उस वक़्त सो रहे थे। मैंने उन्हें जगाया। वो झुंझला कर उठ बैठे और सर खुजाने लगे। फिर कांख खुजाते हुए बोले "क्यूँ बे आज कल बहुते बिजी हो का, मैचो देखने नहीं आये?" मैंने अपनी व्यथा सुनाई। अब तक उनका हाथ पेट पर जा पंहुचा था। वो अपना पेट सहला रहे थे या खुजला रहे थे कहना मुश्किल होगा लेकिन पहले की क्रिया को अगर ध्यान में रखें तो इसे खुजलाना ही कहेंगे।

पांच मिनट तक मैच का ब्यौरा देने के बाद उन्होंने मुझसे दोहा सुनाने को कहा। मैं आनंद-विभोर हो उठा। मैंने उन्हें दोहा सुनाया -

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥

गुरुदेव ने मेरी तरफ हीनता सूचक नेत्रों से देखा और बोले, "पेपरो नहीं पढ़ते हो का?" मुझे आघात लगा। मैं हर रोज़ दो अख़बार मांगता हूँ। मैंने कहा पढता हूँ गुरुदेव, रोज पढता हूँ। "तब कहे इतना बकलोल जैसा कुएस्चन पूछ रहे हो," गुरुदेव ने कहा। मुझे आत्म-ग्लानी तो हुई पर मैं सुनता रहा।

फिर गुरुदेव ने विस्तार से बताया - "देखो ये जो दोहा है ये 'ए राजा' पे बेस्ड है। कबीर सबको राजा जैसा बनाने की सिख देना चाहते हैं। कबीर बता रहे हैं की आम आदमी रात सो कर गँवा देता है और दिन खाना खा कर। जब की ये जन्म तो प्रभु ने इस लिए दिया है की तुम वैभव संपन्न हो सको। ये जन्म अनमोल है खुद को पैसे कोड़ी से बदल लो तो ही इस जनम की सार्थकता है। रात को सो कर मत गवाओ, रात में दारु पी कर डील करो, दिन को खाना खा कर बर्बाद मत करो घूस खाओ और इसी तरह अपना मानव जन्म सफल बनाओ।"

गुरुदेव का असीम ज्ञान देख कर मुझसे रहा नहीं गया। मैंने जो भी दो-चार दोहे पढ़े थे सबका मतलब पूछने लगा। उन्होंने बड़ी प्रेम से हर दोहे को समझाया, उन दोहों का विवरण कुछ इस प्रकार है:

दान दिए धन ना घते, नदी ने घटे नीर ।
अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर ॥

इस दोहे से कबीर का आशय सुरेश कलमाड़ी की तरफ है। इस दोहे के माध्यम से कबीर चोर-चोर मौसेरे भाई वाले मुहावरे से जुड़ने की गुहार लगा रहे हैंकबीर का कहना है की पैसे खाओ तो इधर-उधर अपने चोर भाइयों में दान करते जाओ। गुरुदेव का कहना है की दूसरों को दान देने से धन कहाँ चला जाता है इसका पता नहीं चलता, ना ही धन घटता है। सुरेश कलमाड़ी ने हर कंपनी वाले को पैसा खिलाया है। पूरा देश अपनी आँखों से देख रहा है, लेकिन कोई पता नहीं लगा पा रहा है की पैसा कहाँ गया। जब कबीर को भी पता नहीं चल रहा तो सीबीआई को क्या पता चलेगा।

बानी से पह्चानिये, साम चोर की घात ।
अन्दर की करनी से सब, निकले मुँह कई बात ॥

कबीर कहते हैं की समाज को बस आदमी की बोली से मतलब होना चाहिए। इस दोहे से उनका आशय पी जे थोमस की तरफ है। कबीर समझाना चाहते हैं की आदमी ने क्या किया है उससे कोई मतलब नहीं है। अगर उसे बोलना आता है तो वो कुछ भी कर सकता है। बोलते समय आवाज़ हमेशा अन्दर से आनी चाहिए, फिर आप कोर्ट से लड़ कर भी टिके रह सकते हैं। इसीलिए करो कुछ भी पर बोलो वही जिसकी जरूरत हो। जो बताने की जरूरत ना हो उसे पेट के अन्दर छुपा लो, फिर वो बात मुह से नहीं निकल सकती।

बैध मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार ।
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार ॥

ये कबीर वाणी का सबसे महत्त्वपूर्ण दोहा है। इसके दोहे के माध्यम से कबीर मनमोहन सिंह की तरफ इशारा कर रहे हैं। उनका कहना है की देर-सबेर सब पकड़े जा सकते हैं लेकिन जिसके सर पर किसी बड़े आदमी का हाथ हो वो पकड़ा नहीं जा सकता। एक एक करके सब पर आंच आ रही है ए राजा फस गए, जयराम संकट में हैं लेकिन मनमोहन अब भी सेफ हैं। उनके सर पर देवी का हाथ है, इसीलिए उन्हें कुछ नहीं हो सकता। अतः सबको चाहिए की अपने बॉस को पटा कर रखे, अगर आपके ऑफिस में आपका बॉस आपको पसंद करता है तो आप कुछ भी कर सकते हैं।


इतना ज्ञान पा कर मैं ख़ुशी से नाच रहा था और गुरुदेव निर्विकार भाव से अपनी जांघ खुजला रहे थे। इससे पहले की मैं कुछ कहता गुरुदेव का हाथ फिर से पेट पर गया और बोले, "अब जाओ। बाद में आना। प्रेसर बन गया है।" मैं ज्ञान की इस गंगा को अपने साथ लिए वहां से बह निकला।

Saturday, March 12, 2011

मनुष्य और कुत्ता - एक ललित निबंध

मनुष्य और कुत्तों का एक अनूठा सम्बन्ध है| मनुष्य ने आदि काल से इस बात का प्रचार किया है की कुत्ता मनुष्य का परम मित्र होता है| और मनुष्य कुत्ते को पालता है| सच्चाई तो ये है की मनुष्य हमेशा ही कुत्ता बनाने की चेष्टा करता है और सृष्टि के सृजन से आज तक वो कुत्ते के विलास की वास्तु रहा है| मनुष्य स्वभावतया ही स्वार्थी और डरपोक होता है इसीलिए उसने ऐसी भ्रांतियां फैलाई हैंमनुष्य का कुत्तों के प्रति भय और ऐसा प्रचार, मनुष्यों के भीरूपन और जलन का द्योतक है|

सत्य तो ये है की हर स्त्री की ये कामना होती है की उसका पति कुत्ते जैसा हो| वो सदैव उसके पल्लू से बंधा रहे। उसी के द्वार से रोटी खाए और इधर उधर मुह ना मारेमरते दम तक उसके साथ रहे, और यदि उस पर कभी कोई आंच आये तो पति रुपी कुत्ता हमलावर पे टूट पड़े | पुरुषों की भी अपनी जीवन संगिनी में एक कुतिया देखने की लालसा होती है| वे कामना करते हैं की उनकी पत्नी मोहल्ले की सुंदरी हो| सारे कुत्ते उसके दीवाने हों| लेकिन कुतिया बस उनसे ही प्रेम करे| वो बाकी मनचले कुत्तों को अधीर तो करे, वो भी कुछ इस अदा से की सारे कुत्ते उसके पीछे दुम हिला कर चलते रहें और जरूरत पड़ने पर घर का सारा काम कर जायें| लेकिन जैसे ही कुतिया का काम हो जाये वो भौंक कर या काट कर, जो भी यथोचित हो, उन्हें भगा दे|

मानवों ने हमेशा ही कुत्तों को अपना आदर्श माना है| यही कारण है की कुत्ता किसी भी देवता का वाहन नहीं है, क्यूंकि कुत्ता सर्वोपरि है| महाभारत में भी कुत्तों को विशिष्ट स्थान प्राप्त है| जब युधिष्ठिर पर्वत पर चढ़ रहे थे और उनके सारे भाई दम तोड़ चुके थे, तो उनका मनोबल बढ़ने के लिए कुत्ता ही उनके साथ चला था| इस कुत्ते की प्रेरणा से ही युधिष्ठिर धर्मराज बन पाए|

मानव ने गोपनीय तरीके से सदैव कुत्ता बनाने की चेष्टा की है| मानव को कुत्ता बनाने की शिक्षा बचपन से ही दी जाती है| छात्रों को सिखाया जाता है की जीवन में आगे बढ़ने के लिए कुत्ते की तरह सोना जरूरी है| जब भी कोई आदमी साहसी कार्य करने की चेष्टा करता है, कुत्ते की ही उपमा दी जाती है| कहा जाता है - क्या तुम्हें पागल कुत्ते ने कटा है| इस उपमा में 'पागल' शब्द का इस्तेमाल मनुष्यों का कुत्तों के प्रति जलन का द्योतक है| जो मनुष्य तलवे चाटने की कुत्तिय परंपरा को अपना लेते हैं, उन्हें सफल मन जाता है और अक्सर ऐसे मनुष्य ऊँचाइयों पर पाए जाते हैं (जैसे की नेता और मैनेजमेंट गुरु)| जो लोग ऐसा कर पाने में बहुत सफल नहीं हो पते यानि चाटते हुए जिनके दांत लग जाने खतरा होता है, उन्हें चाटूकार की श्रेणी में रखते हैं|

धीरे- धीरे मानव सभ्यता का विकास हो रहा है और आदमी ने इस बात को खुले तौर पर स्वीकार करना शुरू कर दिया है की वो कुत्ता बनाना चाहता है| इसीलिए पाश्चात्य देशों में नारी को 'BITCH' अर्थात कुतिया कहने का प्रचालन जोर पकड़ रहा है| नेताओं की विशेष कर मानव रुपी कुत्ते पालने का बड़ा शौक होता है| इसलिए वे हमेशा ट्रेनी कुत्तों से घिरे रहते है, जो उनकी एक आवाज़ पर सड़कों पर लोटने लगते हैं, नारे लगाते हैं और हाथापाई पर भी उतर आते हैं| मनुष्य कुत्ते के अन्य काम, जैसे की रखवाली करना भी सीख रहा है| आज कल हर बंगले के बाहर 'सिक्यूरिटी गार्ड' नामक जीव का दिखना आम बात हो गयी है| सिक्यूरिटी एजेंसियां अपनी सार्थकता साबित करने के लिए कुत्तों को बदनाम कर रही है| एक सिक्यूरिटी कंपनी का नाम डोबर्मन था| उसके गार्ड रात को लोगों की अन्दर आने जाने के लिए २०-३० रुपये की मांग करते थे| जबकि कुत्तों ने आज तक ऐसी फिरौती की कभी मांग नहीं की है| मानवों की दुम का भी विकास नहीं हो पाता है| इससे यह सिद्ध होता है आगे डगर लम्बी है, मनुष्यों को सम्पूर्णतया कुत्ता बनाने में अभी कुछ और वक्त लगेगा|

Wednesday, March 9, 2011

सोच

नशाखोर होना नस-खोर होने से बेहतर है।
-सुमित त्रिपाठी

Monday, March 7, 2011

घटा है

माँ इक रोती रही है रात भर,
लड़का उसका लहू किया गया है बीच बाज़ार में|
इक चीख हवा में तैर कर रह गयी है,
हुआ है बलात्कार मानवता के अन्धकार में|
इन्सां इक और आज ख़त्म हुआ है भुखमरी से,
शायद कुछ ज्यादा ही पीछे खड़े था गणतंत्र की कतार में|
पुलिस के डाँडो ने हड्डियां बस नाम की छोड़ी हैं,
उसके बदन में जो लगाता रहा नारे बदलाव की गुहार में|

दयालु भगवान् के आँखों के सामने ही ये सब हुआ होगा,
लोग कहते हैं वो मौजूद है हर जगह संसार में|

Wednesday, March 2, 2011

शहर मेरा..

इमारत एक नयी खड़ी की गयी है,
शहर के बीचो-बीच
मौल बुलाते हैं इसे सारे;

आगे थोडा चलो तो राजभवन पड़ता है,
अनैतिक नीतियाँ सब यहीं से नियति बनती हैं
उन लोगों की जिन्हें आम आदमी बुलाते हैं;

दायें मुड़ जाओ तो थिएटर है एक,
शहर-विदेशों में नाम बहुत है इसका
झील तक उतरती हैं सीढियाँ इसकी
और क्षमता ३०० बताते हैं बैठने की;


पता नहीं लोग फिर भी क्यूँ फूटपाथ पर सोते हैं!